फैटी लिवर यानी लिवर में अत्यधिक चर्बी जमा होना, एक आम स्वास्थ्य समस्या है। यह दो प्रकार का होता है — नॉन-अल्कोहॉलिक फैटी लिवर डिज़ीज़ (NAFLD) और अल्कोहॉलिक फैटी लिवर डिज़ीज़। प्रेग्नेंसी में मुख्य चिंता NAFLD को लेकर होती है, क्योंकि इसका संबंध कई मेटाबॉलिक समस्याओं से होता है।

प्रेग्नेंसी में फैटी लिवर के संभावित प्रभाव:
गर्भावधि मधुमेह (Gestational Diabetes) – फैटी लिवर की वजह से ब्लड शुगर कंट्रोल में गड़बड़ी आ सकती है, जिससे गर्भावधि मधुमेह का खतरा बढ़ जाता है।

हाई ब्लड प्रेशर / प्रीक्लेम्पसिया – यह एक गंभीर स्थिति है जिसमें मां का बीपी बढ़ सकता है और शिशु को नुकसान हो सकता है।

प्रीटर्म डिलीवरी का खतरा – फैटी लिवर से जुड़ी मेटाबॉलिक समस्याओं के कारण समय से पहले प्रसव हो सकता है।

लिवर की गंभीर अवस्था — AFLP (Acute Fatty Liver of Pregnancy) – यह दुर्लभ लेकिन खतरनाक स्थिति है, जो तीसरी तिमाही में देखी जाती है और मां-बच्चे दोनों के लिए जोखिमपूर्ण हो सकती है।

क्या करें?
डॉक्टर से नियमित जांच करवाना जरूरी है, खासकर यदि महिला को पहले से फैटी लिवर की समस्या है।

स्वस्थ डाइट और नियमित एक्सरसाइज से वजन नियंत्रित रखना और लिवर हेल्थ बनाए रखना ज़रूरी है।

ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर और लिवर फंक्शन टेस्ट पर नजर रखना जरूरी है।

यदि फैटी लिवर की पहचान पहले ही हो चुकी है, तो प्रेग्नेंसी प्लान करने से पहले डॉक्टर से सलाह लेना और मेडिकल मैनेजमेंट करवाना बेहतर होता है।

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